रविवार, 8 नवंबर 2020

यादों की किताब/कविता/anjalee chadda bhardwaj

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                यादों की किताब      



©️कॉपीराइट-   anjalee chadda bhardwaj      पंचपोथी के पास संकलन की अनुमति है।इन रचनाओं का प्रयोग   anjalee       की अनुमति बिना कही नही किया जा सकता हैं।





विधा - कविता
शीर्षक- यादों की किताब


मोहब्बत से भरे मेरे दिल का हाल
ज़िंदगी की खुली किताब
जब भी होती हूँ मैं तन्हा अक्सर
खुल जाया करती है ये जनाब

फिर उलझती सी जाती हूँ
ढूंढने में उन सवालों के जवाब
वो जो देखे थे कुछ हसीन नज़ारे
थी हकीकत या फ़िर कोई ख़्वाब

था गज़ब का नशा बातों में उनकी
जैसे हो वो कोई पुरानी शराब
जाने कैसे लगा बैठे खुद को लत
इश्क़-ओ-मोहब्ब़त की बेहद ख़राब

अचानक फिर टूट जाता है भ्रम
थमता है यादों का काफिला जनाब
यादें तो सिर्फ़ गुजरा हुआ पल हैं
मुझे संवारना है अब अपना आज

अब हरगिज़ नहीं चाहती रहूं तन्हा
और फिर खुले उन यादों की किताब
क्योंकि यादों का क्या,वो बिन बुलाए
मेहमान सी चली आती हैं जनाब
-© Anjalee Chadda Bhardwaj
मौलिक स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित रचना






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करवाचौथ/कविता/anjalee chadda bhardwaj

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                करवाचौथ               



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विधा : कविता

शीर्षक : करवाचौथ



पिया आई करक चतुर्थी की पावन बेला

कहीं बीत जाए ना घड़ी सलोनी



आवन राह तुम्हारी निश दिन ताके बिछा    

 पलक-पाँवडे तुम्हारी वैरागिनी



चूड़ी - कंगन, बिछुआ - पायल हथेलियों

में रंग - रंगीली मेहंदी रचा कर



कजरा लगा कजरारे नैनों में, मैं माँग भरे

बैठी हूँ मिलन आस लगाकर



कठिनाई से संभाले बैठी हूँ स्वयं को केवल 

तुम्हारे दिए उन दिलासों पर



साँसें चलती हैं मेरी परंतु थमने सी लगती

हैं कोई संदेशा ना आने पर



निहारती हूँ खिड़की से तो नज़र आते हैं मुझे

अठखेलियाँ करते चंद्र-चंद्रिका



शीतलता का तनिक आभास नहीं अपितु 

जगा देते विरह - रूपी ज्वाला



स्वयं के ही विचारों एवं अनुभूतियों की मैं

सहसा पुनः बनने लगती हूँ बंदिनी



निरंतर विचारों की उधेड़बुन में उलझती

होने लगती हूँ फ़िर मैं निंद्रा कामिनी



पुनः बीत जाएगी आज पावन मिलन की

बेला नव-प्राण ,नव-ऊर्जा संचारिणी



सबके जीवन में छाया प्रेम उजाला परंतु 

केवल आस तुम्हारी बनी मेरी संगिनी



-© Anjalee Chadda Bhardwaj

मौलिक स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित रचना





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शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

आजादी/कविता/nisha kamwal

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                आजादी                 




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शीर्षक:-आजादी

स्वर्णिम उपहार जो हमनें उन वीरो की शहादत से पाया था,उसका नाम आज़ादी कहलाया था,
हुनरमंद होनहार थे,उनके नायाब हौसले वो सच्चे देशभक्त माँ भारती के प्यारे वीरपुत्र कहलाये थे,
सच्चाई, अहिंसा सत्याग्रह त्याग का ले सहारा,बिन खड्ग के आज़ादी का चोला हमें ओढ़ाया था,
वो तो हो रक्तरंजित स्व लहु से तिरंगा बड़ी शान से मेरे प्यारे भारत देश मे उन्ही योद्धा ने लहराया था,
आज भी जो सर्वप्रिय सर्वश्रेष्ठ संस्कृत की सुता मेरी मीठी वाणी हिंदी का मान सम्मान बढ़ाया था,
कर बहिष्कार विदेशी वस्तु का,आज मेरे भारत को समुलता से आत्मनिर्भर बनाया था,
भूलना न कभी सुकर्मों के स्वर्णिम उपहार को,उन्हें याद कर उनकी शहादत में दिल भर आया था।

स्वरचित मौलिक रचना।






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यादें/कविता/dimple khipla

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                    यादें                 




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   "यादें "

यादें रह जाती है, जब सब कुछ चला जाता है। 
जो एक बार चला जाता है, वो वक्त फिर नहीं आता है। 
पास क्या रह जाता है, बस वो बातें,मुलाकातें बस... 
तेरा सपनों में आना बहुत रुलाता है मुझको, पर सपनो
से इंसान कुछ भी नहीं पाता है। यादें रह जाती है, जब सब कुछ चला जाता है। 






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औरत/कविता/Dimple khipla

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               औरत                   



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  औरत


औरत के बड़े ही रंग है। 
घर बसाने वाली भी औरत है,
और घर तोडने वाली भी औरत है। 
घरों में कलेश पडे़ तो औरत का ही नाम आता है।
इतनी बुरी बनादी है संसार ने यह औरत फिर,क्यों
 नही हर मर्द, बिन औरत संसार सजाता है? 


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मंगलवार, 3 नवंबर 2020

आजादी/कविता/neetu aashwani

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                        आजादी                          


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आजादी/कविता/shilpi kanaujia

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                        आजादी                        

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करवाचौथ/कविता/dimple khipla

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                      करवा चौथ                    

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विश्वासघात/कहानी/anjalee chadda bhardwaj

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सोमवार, 2 नवंबर 2020

कविता/Shilpi kanajiya

पंचपोथी - एक परिचय


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Shilpi kanaujiya 



वक्त दोबारा आया है

गुमसुम सी हो गई थी जिंदगी, बेरंग सी लगने लगी थी।
एक उम्मीद की किरण वापस आयी है, ख़ुशी के रंग लाई  है।।

सूना था जो नीम पेड़ का, उस पर फिर से चिड़ियों का बसेरा हुआ है।
चहचहा रही है चिड़िया आज, गूंज रहे है ख़ुशी के मीठे पल ।।

जो सूख गये थे शाखा के पत्ते, उस पर अब हरियाली छायी है।
वक़्त दोबारा आया है, मेहनतकश के पसीनों का हिसाब आया है।।


शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

कविता/nisha kamwal

पंचपोथी - एक परिचय


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Nisha kamwal 

रचना:-1
1) लाल बहादुर शास्त्री जी

नेत्र मुगलसराय में खोले,मुख से शांत स्वभाव थे भोले,
देश जुनूनी थे,सहानुभूति से सरोबार, प्रतिभा के तोले,
न अहम न दम्भ निर्धनों के हित मे हरवक्त मुख खोले,
कर्मठ, कर्णधार देश के वो लाल हर कोई ही ये बोले,

अपने निजी हित को त्याग स्व श्वेद से देश को नहलाया,
आज जो आजादी का जश्न मना रहे ये उनकी है माया,
नारा ऐसा दिया जय जवान,जय किसान सब को भाया,
परिश्रम की भट्टी में स्व को नित नित उस लाल ने तपाया,

देशप्रेमी इस था रणभेरी में जा विश्व शान्ति का गुण गाया,
फिर लहूलुहान उसका कीमती देह फिर देश के काम आया।

स्वरचित मौलिक रचना (निशा कमवाल)
*****************************************



रचना:-2
2) मैं बनूँगा कलाम

चल उनके शाश्वत अनुनय विचारों पर मैं,अपने अथक प्रयासों से कलाम बनूँगा।
हो मेरा राष्ट्र भारत भी सर्वोपरि व सर्वश्रेष्ठ ,मैं अपने निज यत्नों से नवसंचार रचूंगा।
कर जाये जो रौशन,बन दीपक की लौ,मैं एक कर्मठ भविष्यकर्ता तैयार करूँगा।
आये जो मेरे राष्ट्र के काम बन जाये इसकी पहचान मैं वो मिसाइल मैन बनूँगा।
त्याग निज मोह को लूटा अपना सर्वस्व,मैं भारत को रत्नजड़ित राष्ट्र करूँगा।
तकनीक एक उपहार वरदान सम ही है ,इसे संहारक नही एक विज्ञान योद्धा बनाऊंगा।
कर तुच्छ सा त्याग बलिदान इस राष्ट्र को,मैं आने वाले कल के बच्चों का बेहतर बनाऊंगा,
देखा जो एक भारत व श्रेष्ठ भारत का सपना,मैं एकचित व निष्ठावान लक्ष्य के प्रति हो जाऊँगा।

स्वरचित मौलिक रचना (निशा कमवाल)
*****************************************




रचना:-3

3) नदी औऱ नारी

सरिता सम नारी का स्वरूप, जीवनदायनी, जगकल्यानी यह कहलाती है,
दे वारि नदी प्यासे को जीवनदान देती है,दे नारी मानव को जन्मदात्री कहलाती है,
स्वयं झेल हजारों दुख दर्द ये नारी समस्त जन को उबरती है,नारी की भांति यह नदी भी अपनी शीतलता व  वैतरणी पार यह लगाती हैं,

यह नारी है जो जगकामना कि जा सकती है, नदियों से अविरल धारा सलिल प्रवाहित होती जाती है,अपने स्वर में बहती मुस्काती जाती हैं,

तरणी यह शांत अपना वास्तविक रूप खो सागर से मेल करती है,डाली जो बाधा मार्ग में यह नारी सम रौद्र रूप ले सब उजाड़ती है।

स्वरचित मौलिक रचना (निशा कमवाल)
*****************************************



रचना:-4
4) ग्रहण

लगा जो ग्रहण धरती पर मानो विपदा का कोई रंगमंच है,
छल रहे एक दूसरे को तनिक मोह में पल में रचते प्रपंच हैं,
जा रही सम्पूर्ण संस्कृति,सभ्यता गहरे गह्वर व पतन की ओर,
सम्पूर्ण प्रकृति का कालग्रास बना मानव जिसका नही कोई छोर,
लाचारी,बेबसी, विक्षुब्धता हाहाकार मच रहा अब देखो चहुँओर,
न इंसान की इंसानियत बाक़ी हैं, न मानवता की पोशाक विमल है,
जहाँ बहती थी सत्य,अहिंसा की सु सरिता अब वो भी अनिर्मल हैं,

स्वरचित मौलिक रचना (निशा कमवाल)
*****************************************


रचना:-5
5) परिवार
बिन अपनो के साथ के सर्वत्र व समस्त मिथ्या व अहंकार,
पग पग पर छलता हैं सुख चैन फिर लूटता हैं यह संसार ,
न कोई राह होती न कोई देता है सुमार्गदर्शन का आधार,
इसलिये खुशियों की बुनियाद, मुस्कुराने की वजह परिवार।

रखना न कोई भी बैर न कोई मामूली सी भी गलतफहमी,
फिर जमाना लूट लेगा फायदा, फिर जिंदगी होगी सहमी,
स्वंय को दर्पण सा स्वच्छ अक़्स रखे,न करना कोई बेरहमी,
हर परिवार में होती नोकझोंक,हर बातों से न होती बदहजमी,

युगों युगों से चलता आया है, परिवार से ही सब खुशी का साया है,
सब देंगे धोखे इस ज़माने में,परिवार ही बनता मुश्किल में साया है,
सभी रिश्तों की बागडोर बंधी है,यही सबका सच्चा परछाया हैं,
सभी साथी संगी इसमे यहिं हमारे सभी सदस्यों ने सिखाया हैं।।

स्वरचित मौलिक रचना (निशा कमवाल)
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कविता/Sheetal naladkar

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Sheetal naladkar 

शीर्षक  : - " कैसा ये युग आया "

कैसा ये युग आया धर्म अधर्म और नीतिमूल्यों को भूल अत्याचार बढ़ धरती को भी सहन आया।
सहन शक्ति के मर्यादा का अंत हुवा प्रकृति ने भी अंत करना सोच महामारी का कहर ले आया।

मनुष्य अब मनुष्यता को भूल हैवानियत के जनम से हर मनुष्य फ़रेबी बन गया।
इस युग मे सच्चा प्यार कभी न पाया मनुष्य कपड़ो बदलने जैसे पलों में प्यार बदलता पाया।

संस्कारों को भूल नारी को अपमानित कर दुष्टता से नारी को व्यभिचारी बना गया।
दुष्ट प्रवृत्ति का बढ़ता युग ये अब नारी को शक्ति स्वरूपा बनने का वक़्त आया।

अन्याय को न्याय करने काली बनने का, लक्ष्मी स्वरूपा को रणरागिनी बनने का वक़्त आया।
धर्म कर्म से सुसंस्कारी हिन्दू संस्कृति को दौहराकर संस्कार पीरोंकर संस्कृति आगे बढ़ने का वक़्त आया।



शीर्षक : - " अंदर की आवाज़ "
मेरे अंदर की आवाज़ अंतरात्मा से आयी है।

मतलबी दुनियां का मतलब समझ तुझे सच्चाई का गहना पहनना है।
दुष्कर्मियों का फ़रेबी नकाब सिंहिनी बन नोंचकर निकाल फेकना है।

जागरूक बनकर सदा तुझे जागरूक रहना है झुटे का मुँह काला तुझे करना है।
सच्चाई का साथ तुझे देना है चाहे दर्द हो कितना, फिर भी सच्चाई से ही सुकूँ पाना है।

मन की चाह दुतर्फी होती, चाहकर भी पल भर के सुकूँ की लालची जाल में ना कैद होना है।
हे इंसा मन से अच्छे विचारों का प्रेमी तुझे बनना है,बुराई का कत्ल कर मीलों दूर जाना है।

अन्याय के खिलाफ तुझे लड़ना है इंसाफ़ करते कोन अपना कोन पराया ना सोचना है।
इंसाफ़ के तराजू से क़ायदे कानून का उल्लंघन ना कर सही इंसाफ आँखो में पट्टी बांधकर भी करना है।

संयमी बन लेकिन मजबूर कभी ना बनना है, आत्मशक्ति को पहचानकर शिकार न कभी बनना है।
प्रेम मोह माया के जाल से दूर रहकर, त्यागी बन तुझे शिकारी कभी ना  बनना है।

वक़्त तो कभी हाथ का ना रहता ,बुरी सोच से पैर ना कभी फिसलें देना है।
तू कितना भी कामयाबी बन माता पिता के चरणों मे ही
 माथा टेक ज़िन्दगी का स्वर्ग बनाना है।

हे इंसा तू संस्कारी देश का सुजान नागरिक बन ,मन के आतंक से आतंकी ना बनना है।
तुझ से हो खिला संसार सारा भारत के नवनिर्माण का उत्तरोत्तर अधिकारी तुझे बनना है।

मेरे अंदर की आवाज़ को सुनकर मैंने सच्चाई का ही गहना पहना है।




शीर्षक :- " दिमाग़ की शक्ति " ....💕

ज़िन्दगी को नूर से कोहिनूर बनाना है।
तो अपने ज़हन से खुद का दृढ़ संकल्पित लक्ष्य बनाना है।
ए राही आपने राह की ओर बढ़ , एक नए युग का निर्माता बनना है।

हे नवयुग के नवनिर्माता !, तुझे कठोर परिश्रमी बनना है।
कड़ी मेहनत और सच्ची लगन से दिमाग़ में नव शक्ति प्रगट करनी है।

ऐसे लक्ष्य बनाओ की तुम्हारे जहाँ का अधंकार मिट जाए।
तेरे राह पे चलने वाला भी तेरे मिट्टी से सुगंधित हो जाए।

आँधी तूफान बन राह के काँटो का सरताज तू पहन जाए।
जहन से हो जिद्दी लक्ष्य तेरा सूरज से प्रखर रोशनी छा जाए।

प्रबल इच्छाशक्ति के तीर तेरे आसमाँ को भेद जाए।
दिमाग़ की शक्तियों से तेरे आसमाँ का सबल अधिकारी तू बन जाए।

जुनून का अंगारी शोला बन खून की दौड़ से दिमाग़ को दौड़ना है।
अपने दिमाग से वक़्त को मुट्ठी में कैद कर वक़्त को जितना है।

नव युग का तू ही निर्माता बन नयी पीढ़ी की प्रखर नवचेतना बननी है।
दिमाग की चतुराई से उत्तेजित चतुराई की ज्वालामुखी तुझे बननी है।




शीर्षक : - " ड्रीम गर्ल "

माँ के आँखो देखा हर ख़्वाब पूरा करू मैं...
विरुद्ध जाकर बेटी को जन्म देनेवाली अकेली पड़ी है वो ,
आख़िर उसकी ड्रीम गर्ल बनु मैं...

ज़िन्दगी की नयी पहचान माँ की बनाऊँ मैं...
जिदसे लडू , माँ की रोशनी बन ,
बड़ी शिद्दत से उसका हर सुकूँ लौटाऊँ मैं...

माँ के दिखाए राहसे चलू मैं...
संस्कारों वाली नयी सोच की संस्कृति का उदाहरण बन,
कालीसे कल्पना बनू चाँद को छू आऊँ मैं...





🔥🔥शीर्षक :- सीख🔥🔥

सोला संस्कारो में से एक गर्भसंस्कार, गर्भ में ही हमे संस्कार किये जाते है।
ज़िन्दगी की हसीन शुरुआत  शिक्षा एवं सीख देकर  ही शुरू होती है।

बचपन  मे माँ  कहानियां  सुनाती  हमे बारम्बार है।
प्यासे कंवे को सुनकर चतुराई की सीख देती सौ बार है।

ज़िन्दगी में शिक्षा तो हमे हर नए पल से सीखने मिलती है
पहला गुरु माँ ही तो सरस्वती के रूप से सीख देती है।

पाठशाला में हमे ज़िन्दगी जीने एवं आगे बढ़ने की शिक्षा एवं सीख दियी जाती है।
प्रकृति के हर रूप से हमे नयी शिक्षा एवं सीख ज्ञात होती है।

फूल पेड़ पौधों से हर आँधी तूफानों से लड़ने की सीख हमे मिलती है।
वेद पुराणों के पौराणिक कथाओ से संस्कार और जीने के मायने हमे समझाते,एक सीख दे जाता है।

हिंदू संस्कृति ही हमे धर्म ,अर्थ ,काम ,मोक्ष की सीख देते है।
रूढ़ी परंपराओं से हमे ऋषि मुनियों ने ज्ञान विज्ञान की सीख दियी है।

एक समझ से देखा जाए तो जिंदगी में हमे शिक्षाएँ पल पल खूब मिली है।
लेकिन सही मायने से देखा जाए  तो सीख हमे हारने के बाद अनुभवों से मिली है।

वक़्त हमे वो सीख दे जाता है हारने के बाद आत्मविश्वास जागरूत कर,
मंज़िल वही पर राह बदलने की सीख हमे देकर यशोशिखर पे ले जाता है।

मेरे ख्यालों से हमारा वक़्त और हमारी हार ही हमे सही सीख दे जाते है।


कविता/Aayushi singh kashyap

पंचपोथी - एक परिचय


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Aayushi singh kashyap 


विधा- कविता
शीर्षक- महाभारत का संक्षिप्त काव्य रूप
वार- शुक्रवार

जिस युद्ध में हासिल की योद्धाओं ने महारथ।
महाकाव्य है वेदव्यास की रचना ग्रंथ ये महाभारत।।
कथा प्रारम्भ में ही बनें शांतनु सम्राट।
गंगा नामक सुंदरी के सिंदूर भरे ललाट।।
 गंगे शांतनु के हुए कई तेजस्वी सपूत।
किंतु मां के निर्ममता से ना रहा कोई अछूत।।
सात शिशुओं को दिया उसने नदी में बहा।
आठवें को देख शांतनु को ना गया रहा।।
किन्तु गंगा ने स्मरण कराया अपना वचन और सूत्र।
आठवां बालक ही कहलाया देवव्रत गंगापुत्र।।
चार वर्ष व्यतीत कर शांतनु गए यमुना तट ।
तरूणी सत्यवती मिली जो थी एक केवट।।
 देख तरुणी सत्यवती को हिय में भरा उमंग।
शांतनु गए केवट राज के पास लेकर प्रेम प्रसंग।।
राजा के समक्ष एक शर्त रखे केवट राज।
सत्यवती के पुत्र के नाम होगा हस्तिनापुर साम्राज्य।।
शांतनु देवव्रत का था बड़ा ही गहरा संबंध।
टाल दी सत्यवती से बनाने में रक्त संबंध।। 
पिता की व्यथा देवव्रत हुए आत्म विभोर।
सारथी लेकर चल दिए केवट राज की ओर।।
शर्त सुनकर अल्प हो गई सारी विद्या।
अविवाहित रहने की ली अखंड भीष्म प्रतिज्ञा।।
सत्यवती शांतनु से हुए चित्र और विचित्र। 
अंबिका और अंबालिका का विचित्र से जुड़ा रिश्ता पवित्र।। 
अम्बा, अंबिका और अंबालिका को भीष्म ने ली जीत।
अम्बा तो गाती थी हमेशा शाल्व का ही गीत।। 
सौभ देश के शाल्व पर अम्बा थी अनुरुक्त। 
पति मान बैठी थी उसे यह बात थी अभी गुप्त।। 
अम्बा की बात सुनकर भीष्म भेजे उसे शाल्व के पास।
ठुकरा दिया सौभ राज ने तो सब रह गए उदास।। 
बेचारी अम्बा ने सुनाई भीष्म से कथा वृतांत। 
इस विषय में विचित्र भी रहे एकदम शांत।। 
अम्बा ने भीष्म के सर मढ़ी अपनी दुखों का दोष। 
बदला लेने की भाव से चली गई वह दूर कोश।। 
भीष्म के वध की राजाओं से मांगी भीख। 
लेकिन उसकी सेवा में कोई ना हुआ शरीक।। 
चलते चलते हो जाती थी सुबह दोपहरी शाम। 
 ब्राह्मणों ने बताया परशुराम जी का नाम।। 
परशुराम और भीष्म के बीच हुआ जोरदार टक्कर। 
भगवन भी हार गए अम्बा का चला ना कोई चक्कर।। 
तब अम्बा ने शुरू की वन में जाकर तपस्या। 
शिखंडी बनके सुलझ गई उसकी सारी समस्या।। 
स्त्री रूप त्यागकर द्रुपद के गई महल। 
सेनापति बनकर आरंभ की एक नई पहल।।
सूरसेन की कन्या को कुंतीभोज ने लिया गोद। 
कुंती के नाम से कराया उस पृथा का बोध।। 
महर्षि कुंती के सेवा से हुए प्रसन्न। 
दुर्वासा के वरदान से कुंती का विचलित हो गया मन।। 
महर्षि दुर्वासा ने दिया कुंती को एक वरदान। 
ध्यान करोगी जिस देव का देगा वह पुत्र अपने समान।। 
सूर्य के संयोग से सुंदर बालक का हुआ जन्म। 
बहा दिया कुंती ने उसे किंतु अधिरथ हुए प्रसन्न।। 
यही बालक आगे चलकर हुआ कर्ण नाम से विख्यात। 
किंतु यह बात कुंती को ना थी कभी ज्ञात।।
अभी भी बाकी हैं कर्ण की कहानी। 
जो था बहुत दिल से दानी।।
कुंती के विवाह खातिर पिता ने रचा स्वयंवर। 
माला पहनाई पांडु के गले फूल बरसाये अंबर।। 
जिन्होंने किये कई प्रतापी राजा को भी परास्त। 
अंबिका अंबालिका से थे जन्मे पांडु और धृतराष्ट्र।। 
धृतराष्ट्र ने गंधारी से व्याह रचाई। 
पांडु ने भी माद्री की मांग सजाई।। 
कुंती और माद्री ने दिये पाँच पांडव सुत। 
गंधारी ने जन्मे सौ कौरव कपूत।।
पांडु भी शाप से गए स्वर्ग सिधार। 
माद्री भी होकर दुःखी चली गयी इस लोक से पार।।
सत्यवती और बहुएँ भी त्याग गई सब वन। 
 तपस्विनी के भाँति छोड़ गई स्व तन।। 
साथ में ही रहने लगे कौरव और पांडव। 
कौरव करे पांडव पर प्रचंड तांडव।
कपटी दुर्योधन ने बनवाया वरणावत में लाख का घर। 
लेकिन पांडव थे हर परिस्तिथि में ।।
विदुर ने भी भेद दिया था इस समस्या का हल।
सुरक्षित निकल गए बाहर ना पाए कोई जल।
भीमसेन ने किया बकासुर का वध। 
धारण किया सबसे बड़ा बलवानका पद।।
जब पांडवों ने धरा एका चक्र में ब्राह्मण का वेश 
कन्या द्रौपदी के स्वयंवर में व्यस्त था पांचाल नरेश.
इस स्वयंवर में मौजूद थे कई धनुर्धर वीर 
प्रतिबिंब देखकर मारना था मछली की आंख में तीर.
पांडु पुत्र अर्जुन है यह साहस कर दिखाया 
द्रौपदी को ब्याह कर कुंती के पास लाया.
माता ने अनजाने में बहू को पांडवों में दी बांट 
युधिष्ठिर बने इंद्रप्रस्थ के भावी सम्राट.
मामा श्री ने रचा वेयर विरोधी चौसर का खेल 
शकुनी और जुए का था षड़यंत्रकारी मेल.
शकुनि ने युधिष्ठिर को दिया खेल का निमंत्रण 
खेल में बनाया पूर्णत: अपना ही नियंत्रण.
चारों भाई को हार युधिष्ठिर हुए संपत्तिहीन
उन्होंने द्रौपदी की भी स्वतंत्रता उससे ली छिन.
दुशासन ने द्रौपदी का किया चीरहरण 
तब द्रौपदी ने ली श्री कृष्ण गोविंद की शरण.
सखी द्रौपदी की लाज रखी और बढ़ाई चीर 
अपनी माया जाल से ढक दिया पूरा शरीर 
भरी सभा में बैठकर जो देख रहे थे यह पाप 
यज्ञ सैनी ने दिया उन्हें मृत्यु का शाप
दुर्योधन ने भेजा उन्हें 12 वर्ष का वनवास।
मत्स्य देश में बिताया अपना 1 वर्ष अज्ञातवास।।
भीम ने पाई बल और अर्जुन ने पाशुपतास्त्र।
नकुल देव ने ली आयुर्वेद युधिष्ठिर ने बढ़ाया शास्त्र।।
वनवास की अवधि पूरी होने में कुछ ही दिन शेष।
पांचों भाई कर रहे थे जल का ही अन्वेष।।
कुछ ही दूरी पर दिखाएं छोटा सा जलाशय।
नकुल सह अर्जुन भीम ने पूर्ण कि अपनी आमाशय।।
जलाश्य के पास मृत पड़े थे चारों भाई।
यह देख युधिष्ठिर की आंखों में आंसू भर आईं।।
युधिष्ठिर ने भी जलाशय में हाथ लगाई।
तभी एक यक्ष की आवाज कानों तक आई।।
यक्ष ने पूछे कई प्रश्न युधिष्ठिर ने दिया उत्तर।
पक्षपात रहित न्याय देखकर वह भी रह गए निरुत्तर।।
चारों भाई हो गए फिर से जीवित। 
 यक्ष संवाद रही युद्धिस्थिर तक ही सीमित।।
बारह वर्ष का पूर्ण हुआ जब वनवास.
विराट राज में अर्जुन बने नर्तकी द्रौपदी बनी दास.
भीम बने रसोईया तो युद्धिष्ठिर बने मंत्री कंक.
रखवाली करते अस्तबल का नकुल सहदेव संग.
विराट पुत्री उत्तरा और सुभद्रे पुत्र का हुआ लगन.
कर्ण ने कवच कुंडल भी दे दिया दान। 
ये दुनिया करती उसके दानी होने की गान। 
कौरवों के साम्राज्य पर छाया काला बादल सघन.
राजदूत संजय को थी दिव्य दृष्टि का वरदान.
धृतराष्ट्र के समक्ष करते युद्ध का बखान.
गोविंद ने दी एक क्षण में पार्थ को संपूर्ण गीता ज्ञान.
कौरवों की बलि चढ़ाने की अर्जुन  ने ली ठान.
भुगदना होगा कौरवों को चीरहरण का परिणाम.
अब शुरू होता है महाभारत का महासंग्राम.
पहले ही दिन युद्ध में भीष्म ने किया प्रहार.
इस जीत पर दुर्योधन ने मनाया खुशी का त्योहार.
दसवें दिन भीष्म भी शिखंडी के हाथों हो गए धाराशायी.
फिर पांचों पांडव ने उन्हें शर - शय्या पर सुलाई.
तेरहवें दिन अभिमन्यु ने व्यूह को दिया तोड़। 
जिसके रचनाकार थे स्वयं गुरुद्रोड़।। 
चक्रव्यूह में रण करने को अभिमन्यु ने थी ठानी। 
नौ माह में सीखी विद्या और सोलह साल की थी जवानी।। 
नहीं पता था अंतिम बाधा कैसे तोड़ी जायेगी। 
हार को विजय में कैसे मोड़ी जायेगी।।
इतने में दुष्ट दुशासन ने पीछे से किया वार। 
निष्प्राण हुए एक गदे से सिर पर किया प्रहार.
पुत्र सुभद्रा कुरुक्षेत्र में आंख बंद कर सो गया.
अंबर का तेजस्वी धारा धूमकेतु सा खो गया।
धृष्टद्युम्न ने भी किया द्रोणाचार्य का अंत। 
कर्ण का भी अर्जुन ने किया वध तुरंत। 
अर्जुन ने भीष्म को अंतिम बार पिलाई पानी।
दुष्ट दुर्योधन की भी हो गई खत्म कहानी। 
द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने किया पांडवों का नमन.
उत्तरा के गर्भ से हुआ परीक्षित का जनम।
लाल रंग से सन गया कुरुक्षेत्र का रण।
भागवत भूमि लाशों की दरिया गई थी बन।
इस युद्ध में कुंती पांडु पुत्रों का हुआ हित। 
अधर्म पर धर्म की हुई ये शानदार जीत। 
ये थी भारत के महाकाव्य की संक्षिप्त कहानी। 
जिसे हर नर नारी ने हैं दिल से मानी। 
                    


                            खामोश क़लम (कलम की जादूगरनी)
         



हमारे कवि व उनकी रचनाएँ 







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शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

कविता/manisha rathod

पंचपोथी - एक परिचय


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कविता/mahesh D

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बुधवार, 28 अक्टूबर 2020

कविता/ Dimple khipla

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कविता/पूजा गौतम

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कविता/अनिल प्रसाद सिन्हा

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मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

कविता/bhavana dutt

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बाबू/कहानी/जेआर बिश्नोई

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रविवार, 25 अक्टूबर 2020

कविता/Sikha srivastva

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पंचपोथी

पंचपोथी - एक परिचय      Bloomkosh अन्धकार है वहाँ जहाँ आदित्य नहीं, मुर्दा है वो देश जहाँ साहित्य नहीं।। नमस्कार  तो कैसे है आप लोग? ठीक हो ...